Friday, May 1, 2009
किसान विद्यालय किसानों को पढानें का नायाब तरीका
किसान विद्यालय किसानों को पढानें का नायाब तरीका है। जो किसानो को उनके अनुभवों को बाँटने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है। दुनिया का पहला किसान विद्यालय वर्ष १९८९ में इंडोनेशिया के जावा दीप में खोला गया था। यह विद्यालय धान की फसल बोने वाले उन किसानों के बीच खोला गया था जो लम्बे समय से रसायनों का प्रयोग कित्नाशाको के रूप में कर रहे थे। किसान विद्यालय की परिकल्पना के पीछे मूल बात यह थी की किसान जो प्रतिदिन खेती के प्रयोग में लगे रहतें हैं उनके ही अनुभवों के माध्यम से उनसे जैविक कृषि, कृषि पारिस्थितिकी, कृषि आर्थिकी और कृषि पर्यावरण की बात की जा सके। इस तरह कृषि में रोज किये जा रहे उनके प्रयोग और व्यावहारिक ज्ञान का समग्र रूप से लाभ उठाया जा सके।
उत्तर प्रदेश में सन २००० में कृषि विविधिकरण परियोजना को प्रयोग के तौर पर अपनाया गया। जिसे प्रचिलित रूप में डास्प परियोजना के नाम से जाना जाता है। इसके तहत प्रदेश में किसान स्कूलों का गठन किया गया। इन स्कूलों की विशेषता यह थी की इनकी अपनी एक सुगठित नियमावली थी। इसके पीछे उनकी सोच विद्यालय को सुचारू रूप से चलाना था। ताकि विद्यालय से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्य का बोध हो सके।
इस सम्बन्ध में गोरखपुर envayrme एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डाक्टर शिराज ० ए० वजीह का कहना है ' की गोरखपुर एन्वय्र्मेंतल एक्शन ग्रुप लम्बे समय से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कृषि और उसकी चुनौतियों को लेकर कार्य कर रही है। जो पिछले पॉँच सालों से गोरखपुर के दो ब्लाकों में कुल १२ स्कुल चला रही है। सभी किसान स्कूल किसानों की खेती में आने वाली समस्याओं पर चर्चा करने और उनके समाधान पाने के लिए एक कारगर मंच साबित हुए हैं।
यह स्कूल अपने स्वरुप में बेहद अनौपचारिक हैं। तीन से चार गांवों के बीच किसी सार्वजनिक स्थल पर चलने वाले इन स्कूलों का कोई भी किसान बिना कोई पैसा दिए सदस्य बन सकता है। इन स्कूलों की बैठक माह में एक बार होती है। किसानों की समस्या को जानने के लिए पीले रंग का एक समस्या कार्ड होता है जिसे स्कुल के १५ दिन पहले गांवों में वितरित कर दिया जाता है। स्कूल के दिन समस्या कार्डों द्वारा चुनी गई और वर्गीकृत की गई समस्याओं पर चर्चा की जाती है। इन समस्याओं का समाधान किसानों के आपसी अनुभवों से निकालने की कोशिश की जाती है। प्रत्येक स्कूल के दिन समस्याओं के समाधान के लिए उस विषय के जानकार भी रहते हैं। इन स्कूलों की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है की स्कूल से जुड़े लोग साल भर की कार्ययोजना ख़ुद एक साथ बैठ कर बनाते हैं। जिसमें कृषि सम्बन्धी माहवार चर्चा के विषय और कार्य निर्धारित किये जाते हैं।
पिछले पॉँच सालों में गोरखपुर के दो ब्लाकों में गोरखपुर envayrme एक्शन ग्रुप के कुल ग्यारह स्कूल चल रहे हैं। सभी किसान स्कूल किसानों की खेती में आने वाली समस्याओं पर चर्चा करने और उनके समाधान पाने के लिए एक कारगर मंच साबित हुए हैं।
मास्टर ट्रेनर किसान स्कूलों की एक मजबूत कड़ी है। किसान स्कूलों में आने वाली समस्याओं के चुनाव और निराकरण में इनकी प्रमुख भूमिका है। महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में किसान स्कूलों का दूसरा बड़ा योगदान यह है की इन स्कूलों नें महिलाओं को तकनिकी रूप से मजबूत तथा सबल बनाने का काम किया है। स्कूल से जुड़ने के पश्चात् महिलाओं को न केवल बाहर की दुनिया में कदम रखने का साहस दिया है बल्कि उन्हें कृषि तकनिकी के विषय में जानकर बनाने का काम भी किया है। कुछ महिलाएं कृषि तकनिकी की इतने सफल जानकार के रूप में सामने आई हैं की उन्हें समय-समय पर गैर व् कम रासायनिक खेती के सम्बन्ध में प्रशिक्षण देने के लिए अन्य संस्थओं द्वारा निमंत्रण दिया जाता है. इस तरह हम देखते हैं की किसान विद्यालय किसानो के लिए एक प्रभावी माध्यम हो सकते हैं उनके खेती सम्बन्धी उचित ज्ञान के लिए.
Monday, February 2, 2009
काला अज़ार के रोगियों के लिए पर्याप्त जाँच और दवाएं उपलब्ध नहीं
काला अज़ार के रोगियों के लिए पर्याप्त जाँच और दवाएं उपलब्ध नहीं
प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे काला अज़ार पर चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) में भाग ले रहे चिकित्सकों का मानना है की काला अज़ार का अनुपात कम करने के लिए और काला अज़ार के उपचार के लिए जो दवाइयाँ हैं उनके प्रति लोगों में प्रतिरोधकता का दर कम करने के लिए, यह आवश्यक है कि काला अज़ार के उपचार के लिए असरदायक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए और इसकी जाँच होने के लिए सुविधाएँ बढ़ाई जाए। इस अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) एक अति-महत्त्वपूर्ण शोध के परिणाम घोषित कर रहा है जिसके अनुसार काला अज़ार के उपचार में "लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी" (अम्बिसोम) एक प्रभावकारी भूमिका निभा सकता है।
बिहार प्रदेश में, जहाँ काला अज़ार महामारी का रूप लिए हुए है, वहाँ पर 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) के शोध से यह नतीजा सामने आया है कि 'लिपोसोमल अम्फोतेरीसिन बी' से काला अज़ार का उपचार अत्यधिक प्रभावकारी है, और सफल इलाज का दर ९८% आया है, काला-अज़ार सम्बंधित मृत्यु दर भी कम हुआ है और काला अज़ार का उपचार सफलतापूर्वक पूरा करने वालों के दर में भी गिरावट आई है। इस 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से काला अज़ार के उपचार करने पर, इस रोग के दुबारा होने के दर में भी कमी आई है, यह दवाएं कम 'टोक्सिक' हैं, और उपचार की अवधि अन्य दवाओं के मुकाबले कम है।
"हालाँकि काला अज़ार के उपचार के लिए 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' एकमात्र दवा नहीं है, परन्तु यह शोध द्वारा प्रमाणित हुआ है कि यह सबसे प्रभावकारी और सुरक्षित इलाज का विकल्प है। हमारा मानना है कि इस दवा को 'काला अज़ार के उपचार के लिए भारतीय प्रोटोकोल' में शामिल करना चाहिए" कहना है डॉ० नायिन्स लीमा का जो 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) की 'ट्रोपिकल' चिकित्सक सलाहाकार हैं।यदि काला अज़ार का इलाज न किया जाए, तो यह घातक भी हो सकती है।
मानव में काला अज़ार का रोग, काला-अज़ार से संक्रमित 'सैण्ड' मक्खी के काटने से फैलता है। हालाँकि विकसित देश काला अज़ार से संभवत: अनभिज्ञ हैं, यह 'पैरासिटिक' रोग विश्व में लगभग १ करोड़ २० लाख लोगों को ग्रसित किए हुए है। प्रति वर्ष लगभग ५ लाख लोग काला अज़ार से संक्रमित होते हैं, और इनमें से ५० प्रतिशत भारत में है। भारत में काला अज़ार विशेषकर बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में महामारी का अनुपात लिए हुए है। इन भारतीय प्रदेशों में काला अज़ार मुख्यत: ग्रामीण छेत्रों में हाशिये पर रह रहे गरीब लोगों को ही सबसे भयंकर तरीके से प्रभावित करता है।
'सोडियम स्टिबोग्लूकोनेट', काला अज़ार का सबसे प्रचलित उपचार है। परन्तु इस दवा से लोगों में बढ़ती प्रतिरोधकता अत्यन्त चिंता का विषय है - खासकर कि भारत में, जहाँ लगभग ६५ प्रतिशत रोगियों को ऐसा काला अज़ार होता है जिसका कीटाणु संक्रमण के पहले से ही इस दवा के प्रति प्रतिरोधक होता है, और इसीलिए इन लोगों में यह दवा असरकारी होगी ही नहीं। शोध एवं विकास कार्यक्रमों ने काला अज़ार को नज़रअंदाज़ किया है।"विकासशील देशों में काला अज़ार के रोगियों को बहुत लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया है। हमारे प्रोजेक्ट में, लोग तब स्वास्थ्य केन्द्र पर आते हैं जब काला अज़ार का रोग बहुत बढ़ गया होता है क्योंकि इन लोगों को न तो काला अज़ार के प्रारंभिक लक्षण के बारे में जानकारी होती है, और न ही यह पता होता है कि काला अज़ार की जांच के लिए और इलाज के लिए कहाँ जाएँ", कहना है गारेथ बैरेट का।
"जिन लोगों में काला अज़ार का अनुपात अत्याधिक है, उनको जांच और उपचार उपलब्ध नहीं है, और गरीबी के कारण अक्सर इन्हीं लोगों में उपचार गुणात्मक दृष्टि से कमजोर होता है, जिससे काला अज़ार फैलने का खतरा और दवा के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है" 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' दवा से काला अज़ार के उपचार का खर्च रुपया २१,८५५ (यूरो ३५०) प्रति रोगी आता है जो बहुत महँगा है। "इस दवा की कीमत को जल्द-से-जल्द कम करने की आवश्यकता है, 'जेनेरिक' दवाएं एवं अन्य दवाओं के साथ मिलाकर इसको बनाने की भी जरुरत है जिससे कि भारत जैसे देशों में यह दवा काला अज़ार के उपचार के लिए प्रथम इलाज का विकल्प हो" कहना है गारेथ बैरेट का।
'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) इस सत्य का स्वागत करता है कि काला अज़ार पर अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन भारत में संपन्न हो रहा है, और भारत से अपील करता है कि वोह काला अज़ार की रोकधाम के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाने का वादा करे, और जो लोग समाज में हाशिये पर रहते हैं और काला अज़ार से सबसे अधिक संक्रमित हो सकते हैं, उन तक काला अजार की जांच एवं उपचार सेवाएँ उपलब्ध कराये।'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है, जो भारत में १९९९ से कार्यरत है। बिहार में हाजीपुर रेफेरल अस्पताल में, एम्.एस.ऍफ़ काला अज़ार की जांच और उपचार सेवाएँ लोगों को प्रदान कर रहा है। जुलाई २००७ से एम्.एस.ऍफ़ ने ६,५०० से भी अधिक लोगों को काला अज़ार की जांच सेवाएँ उपलब्ध करायी हैं, और इनमें से जिन २,५०० लोगों को काला अज़ार संक्रमण था, उनको 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से उपचार उपलब्ध कराया है।
अमित द्विवेदी
Friday, August 22, 2008
sarvekshan -1
आभार:-
इस सर्वेक्षण में अपना बहुमूल्य योगदान देने के लिए छत्रपति शाहू जी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्षा, विश्व स्वस्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से वर्ष २००५ में सम्मानित तथा विश्व स्वस्थ्य संगठन द्वारा संचालित तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र के प्रमुख, (डॉ.) रमाकांत के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं. श्री अभिषेक मिश्रा और श्री रितेश आर्य के भी आभारी हैं जिन्होंने आंकडों के एकत्रीकरण में अपना बहुमूल्य समय दिया और अमित द्विवेदी जिन्होंने इस पूरे सर्वेक्षण में अपना सहयोग प्रदान किया। हम इस सर्वेक्षण के सभी उत्तरदाताओं के आभारी हैं जिन्होंने प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अपना बहुमूल्य समय और सहयोग देकर इस प्रयास को सफल बनाया.
पृष्ठभूमि:-
तम्बाकू विश्व में रोकी जा सकने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बन रहा है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है की तम्बाकू से इस वर्ष पचास लाख से ज्यादा लोगों की मौत होगी जो टीबी, ऐड्स तथा मलेरिया को milaakar होने वाली कुल मौतों की संख्या से भी अधिक है. यदि कठोर कदम नहीं उठाये गए तो तम्बाकू से इस शताब्दी में दस khrab लोगों kee मृत्यु का अनुमान लगाया गया है. यद्यपि तम्बाकू से होने वाली मौतें कम ही शीर्षक samaachar बन पाती हैं, परन्तु तम्बाकू के कारण हर ६ सेकंड में एक मौत होती है.
नीतियां:-
भारत में तम्बाकू से प्रतिवर्ष दस लाख से भी ज्यादा लोगों kee मृत्यु होती हैं. तम्बाकू सेवन की रोकथाम तथा tambakoo जनित रोगों, अक्षमताओं तथा मृत्यु को कम करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने तम्बाकू की रोकथाम के लिए एक विस्तृत नीति को lagoo किया है –sigaret तथा अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम -२००३. तब से विभिन्न नियम एवं कानून द्वारा इस अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों को प्रभावकारी रूप से lagoo किया जा रहा है. इसके अलावा विश्व की पहली जन स्वस्थ्य एवं उद्योगों की जवाबदेही के लिए बनी संधि –Framework कन्वेंशन aun Tobaco कंट्रोल पर ५ फरवरी, २००५ को भारत ने भी हस्ताक्षर किया है तथा भारतीय संसद ने इस संधि का समर्थन किया है. मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण नीतियों के बावजूद न सिर्फ़ तम्बाकू का सेवन करने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या बढ़ी है बल्कि तम्बाकू जनित रोगों, अक्षमताओं तथा मृत्यु की संख्या में भी महत्वपूर्ण बढ़त देखी गई है.जन swaasthya नीतियों को प्रभावकारी ढंग से lagoo करना भारत एवं विश्व के अन्य राष्ट्रों के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती है.
मुद्दे:-
विश्व swaasthya संगठन के मुताबिक तम्बाकू एकमात्र ऐसा उत्पाद है जो वैध रूप से बेचा जा सकता है और इसका उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हानि pahunchata है- तम्बाकू का प्रयोग करने वाले सौ में से पचास की मौत निश्चित है. कम दाम, प्रभावकारी तथा भ्रामक बाजारीकरण, तम्बाकू से हानि के विषय में जागरूकता की कमी, इसके प्रयोग के विरुद्ध असंगत जन योजनाओं के कारण तम्बाकू का प्रयोग विश्व में सामान्य रूप से किया जाता है. तम्बाकू से swaasthya पर पड़ने वाले कुप्रभाव वर्षों और दशकों तक स्पष्ट रूप से पता नहीं चलते.इसलिए एक तरफ़ जब तम्बाकू का सेवन विश्व में बढ़ रहा है तभी दूसरी तरफ़ तम्बाकू जनित रोग तथा मृत्यु की अभी शुरुआत हुई है.
आगे की ranneeti :-
परन्तु हम भविष्य परिवर्तित कर सकते हैं. यह तम्बाकू महामारी विनाशकारी है लेकिन इसकी रोकथाम संभव है, इसके लिए हमें तम्बाकू के खिलाफ तुंरत सशक्त प्रयास करने चाहिए.हम इस तम्बाकू महामारी को रोक सकते हैं तथा तम्बाकू मुक्त विश्व की और अग्रसर हो सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें अभी से ही प्रयास करने होंगे.
सर्वेक्षण :-
उद्देश्य:-
• भारत kee राष्ट्रीय तम्बाकू उपयोग सांख्यिकी को लखनऊ शहर str पर pramanit करना. • भारत में मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण नीतियों के विषय में जागरूकता के str का पता लगना • तम्बाकू नियंत्रण अभियान, जो कम खर्चे पर काफी प्रभावकारी रहे हैं, इस पर समुदाय के लोगों का नजरिया जानना. • सर्वेक्षण के नतीजों को मीडिया के विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रचारित करना तथा राष्ट्रीय str के सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को तम्बाकू के विषय में जागरूक करना।
विधि:-
प्रश्नावली की रचना
• प्रश्नावली की रचना के लिए हम लोगों ने विभिन्न छेत्र के लोगों की सहायता ली जैसे- शोधार्थी, सांख्यिकी के विशेषज्ञ,तम्बाकू नियंत्रण अभियान में लगे विशेषज्ञ जिससे की प्रश्नों को आसान और लोगों द्वारा आसानी से समझ में आ सकने वाला बनाया जा सके.
• १५ प्रश्नों को चार भागो में baanta गया था.(विस्तृत जानकारी के लिए अन्नेक्सुरे देखें)• उत्तरदाता के विषय में व्यक्तिगत जानकारी.• एक खंड उन उत्तरदाताओं के लिए था जो तम्बाकू का प्रयोग करते हैं, जिस से उनके तम्बाकू प्रयोग के इतिहास के बारे में जाना जा सके. • भारत में तम्बाकू नियंत्रण अधिनियम और उस से सम्बंधित नीतियों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन.
आंकडों का अंकन:-प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित कोडेड बहुविकल्प थे.
डाटा शीत
हमने माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल शीत तथा उसके सूत्र की सहायता से आंकडों को अंकित किया और उसका मूल्यांकन किया.
आंकडों का एकत्रीकरण:-
• आंकडों को एकत्र करने के लिए हमने सर्वेक्षण kartaon की एक टीम बनाई जिसमें महिला और पुरूष दोनों सम्मिलित थे.• sarvekshan kartaon के नाम:१. Aalok कुमार dwivedee . सारिका त्रिपाठी • ५ दिनों (२८ जुलाई- १ अगस्त, २००८) में ७६३ उत्तरदाताओं से आंकडे एकत्र किए गए.• सर्वेक्षण स्थान: इस सर्वेक्षण में हर तरह के लोगों को सम्मिलित करने के उद्देश्य से हमने ऐसे स्थानों को चुना जहाँ हर तरह के लोग आते हो जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन और बाज़ार. • सर्वेक्षण kartaon को इस सर्वेक्षण की विधि और प्रत्येक प्रश्न की संवेदनशीलता के विषय में पूरी जानकारी दी गई जिस से उत्तरदाताओं को किसी प्रकार की हिचकिचाहट न हो. सर्वेक्षण kartao को निर्देश:- • उत्तरदाताओं को अपना परिचय देना तथा इस सर्वेक्षण के विषय में उन्हें जानकारी देना.• कोई भी प्रश्न पूछने से पहले उत्तरदाताओं की agya लेना.• उत्तरदाताओं से प्रत्येक प्रश्न विनम्रता पूर्वक poochhna जिस से की वे बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर दे सकें.
Tuesday, August 19, 2008
इस सर्वेक्षण में अपना बहुमूल्य योगदान देने के लिए छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्षा, विश्व स्वस्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से वर्ष २००५ में सम्मानित तथा विश्व स्वस्थ्य संगठन द्वारा संचालित तम्बाकू नशा उन्मूलन केंद्र के प्रमुख प्रोफ्फ. (डॉ.) रमाकांत के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं. श्री अभिषेक मिश्र और श्री रितेश आर्य के भी आभारी हैं जिन्होंने आंकडों के एकत्रीकरण में अपना बहुमूल्य समय दिया और अमित द्विवेदी जिन्होंने इस पुरे सर्वेक्षण में अपना सहयोग प्रदान किया, हम इस सर्वेक्षण के सभी उत्तरदाताओं के आभारी हैं जिन्होंने प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अपना बहुमूल्य समय और सहयोग देकर इस प्रयास को सफल बनाया।
पृष्ठभूमि:-
तम्बाकू विश्व में रोकी जा सकने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारन है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि तम्बाकू से इस वर्ष पचास लाख से ज्यादा लोगों कि मौत होगी जो टीबी, हिव/ऐड्स तथा मलेरिया को मिलकर होने वाली कुल मौतों कि संख्या से भी ज्यादा होगी. वर्ष २०३० तक यह मृत्यु डर ८० लाख प्रतिवार श के आंकडे को भी पार कर लेगी. यदि कठोर कदम नहीं उठाये गए तो तम्बाकू से इस शताब्दी में दस ख़राब मृत्यु का अनुमान लगाया गया है. यद्यपि तम्बाकू से होने वाली मौतें कम ही शीर्षक बन पति हैं, परन्तु तम्बाकू के कारन हर छेह सेकंड में एक मौत होती है।
नीतियां:-
भारत में तम्बाकू से प्रतिवर्ष दस लाख से भी ज्यादा मृत्यु होती हैं. तम्बाकू कि रोकथाम तथा तम्ब्कू जनित रोगों, अक्षमताओं तथा मृत्यु
को कम करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने तम्बाकू कि रोकथाम के लिए एक विस्तृत नीति को लागु किया –cigarette तथा अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम -२००३. तब से विभिन्न नियम एवं कानून द्वारा इस अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों को प्रभावकारी रूप से लागु किया जा रहा है. इसके अलावा विश्व कि पहली जन स्वस्थ्य एवं उद्योगों कि जवाबदेही के लिए बनी संधि –Framework कन्वेंशन ओं तोबक्को कंट्रोल (फ.क.टी.क.) पर ५ फरवरी, २००५ को भारत ने भी हस्ताक्षर किया है तथा भारतीय संसद ने इस संधि का समर्थन किया है. मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण नीतियों के बावजूद न सिर्फ़ तम्बाकू का सेवन करने वाले बच्चों और युवाओं कि संख्या बढ़ी है बल्कि तम्बाकू जनित रोगों, अक्षमताओं तथा मृत्यु कि संख्या में भी महत्वपूर्ण बढ़त देखि गई है.जन स्वस्थ्य नीतियों को प्रभावकारी ढंग से लागु करना भारत एवं विश्व के अन्य राष्ट्रों के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती है।
मुद्दे:-
व्हो के मुताबिक तम्बाकू एकमात्र ऐसा उत्पाद है जो वैध रूप से बेचा जा सकता है और इसका उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हनी पहुचता है- तम्बाकू का प्रयोग करने वाले सौ में से पचास कि मौत निश्चित है. कम दाम, प्रभावकारी तथा भ्रामक बाजारीकरण, तम्बाकू से हनी के विषय में जागरूकता कि कमी, इसके प्रयोग के विरुद्ध असंगत जन योजनाओं के कारन तम्बाकू का प्रयोग पुरे विश्व में सामान्य रूप से किया जाता है. तम्बाकू के स्वस्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभाव वर्षों और दशकों तक स्पष्ट रूप से पता नहीं चलते.इसलिए एक तरफ़ जब तम्बाकू का सेवन विश्व में बढ़ रहा है तभी दूसरी तरफ़ तम्बाकू जनित रोग तथा मृत्यु कि अभी शुरुवात हुई है.
आगे कि राद्नीति:-
परन्तु हम भविष्य परिवर्तित कर सकते हैं. यह तम्बाकू महामारी विनाशकारी है लेकिन इसकी रोकथाम संभव है, इसके लिए हमें तम्बाकू के खिलाफ तुंरत सशक्त प्रयास करने चाहिए.
हम इस तम्बाकू महामारी को रोक सकते हैं तथा तम्बाकू मुक्त विश्व कि और अग्रसर हो सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें अभी से ही प्रयास करने होंगे.
सर्वेक्षाना:-
उद्देश्य:-
· भारत के राष्ट्रीय तम्बाकू उपयोग सांख्यिकी को लखनऊ शहर स्टार पर प्रमाणिक करना.
· भारत में मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण नीतियों के विषय में जागरूकता के स्टार का पता लगना
· तम्बाकू नियंत्रण अभियान, जो कम खर्चे पर काफी प्रभावकारी रहे हैं, इस पर समुदाय के लोगों का नजरिया जानना.
· सर्वेक्षण के नतीजों को मीडिया के विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रचारित करना तथा राष्ट्रीय स्टार के सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को तम्बाकू के विषय में जागरूक करना।
विधि:-
प्रश्नावली कि रचना
प्रश्नावली कि रचना के लिए हम लोगों ने विभिन्न छेत्र के लोगों कि सहायता ली जैसे- शोधार्थी, सांख्यिकी के विशेषज्ञ,तम्बाकू नियंत्रण अभियान में लगे विशेषज्ञ जिससे कि प्रश्नों को आसन और लोगों द्वारा आसानी से समझ में आ सकने वाला बनाया जा सके.
१५ प्रश्नों को चार भागो में बनता गया था.(विस्तृत जानकारी के लिए
अन्नेक्सुरे देखें)
उत्तरदाता के विषय में व्यक्तिगत जानकारी.
एक खंड उन उत्तरदाताओं के लिए था जो तम्बाकू का प्रयोग करते हैं, जिस से उनके तम्बाकू प्रयोग के इतिहास के बारे में जन जा सके.
भारत में तम्बाकू नियंत्रण अधिनियम और उस से सम्बंधित नीतियों कि प्रभावशीलता का मूल्यांकन.
आंकडों का अंकन:-
प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित कोडेड बहुविकल्प थे.
डाटा शीत
हमने माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल शीत तथा उसके सूत्र कि सहायता से आंकडों को अंकित किया और उसका मूल्यांकन किया.
आंकडों का एकत्रीकरण:-
आंकडों को एकत्र करने के लिए हमने सर्वेक्शंकर्ताओं कि एक टीम बनाई जिसमें महिला और पुरूष दोनों सम्मिलित थे.
सवेक्शंकर्ताओं के नाम:
अलोक कुमार द्विवेदी
सारिका त्रिपाठी
५ दिनों (२८ जुलाई- १ अगस्त, २००८) में ७६३ उत्तरदाताओं से आंकडे एकत्र किए गए.
सर्वेक्षण स्थान: इस सर्वेक्षण में हर तरह के लोगों को सम्मिलित करने के उद्देश्य से हमने ऐसे स्थानों को चुना जहाँ हर तरह के लोग आते हो जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन और बाज़ार.
सर्वेक्शंकर्ताओं को इस सर्वेक्षण कि विधि और प्रत्येक प्रश्न कि संवेदनशीलता के विषय में पुरी जानकारी दी गई जिस से उत्तरदाताओं को किसी प्रकार कि हिचकिचाहट न हो.
सर्वेक्शंकर्ताओ को निर्देश:-
उत्तरदाताओं को अपना परिचय देना तथा इस सर्वेक्षण के विषय में उन्हें जानकारी देना.
कोई भी प्रश्न पूछने से पहले उत्तरदाताओं कि आगया लेना.
उत्तरदाताओं से प्रत्येक प्रश्न विनम्रता पूर्वक पूछे जायें जिस से कि वे बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर दे सकें.
सर्वेक्षण के परिणाम:-
कुल ७६३ उत्तरदाताओं में ७० प्रतिशत पुरूष तथा ३० प्रतिशत महिलाएं थी।
विश्व स्वस्थ्य संगठन कि वर्ष २००८ कि एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के युवाओं में तम्बाकू का प्रयोग १४.१ प्रतिशत है, जिसमें से पुरुषों में १७.३ प्रतिशत और महिलाओं में ९.७ प्रतिशत है. भारत के वयस्कों में तम्बाकू उपयोग पुरुषों तथा महिलाओं में क्रमशः ५७ प्रतिशत और ३.१ प्रतिशत है.राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वेक्षण कि २००६ कि रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर तम्बाकू उपयोग १८ से २४ वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में पाया गया है. हमारे सर्वेक्षण में ज्यादातर उत्तरदाता ३० से ५० वर्ष कि आयु वर्ग में थे, इसके बाद १८-३० वर्ष(३९%) ११ प्रतिशत उत्तरदाता ५० वर्ष या इससे ज्यादा आयु के थे और मात्र ६ प्रतिशत उत्तरदाता ०-१८ वर्ष कि
आयु वर्ग में थे.
कई आंकडे इस और इंगित करते हैं कि तम्बाकू प्रयोग सभी प्रकार के शैक्षणिक पृष्ठभूमि के लोगों में प्रचिलित है,इसमें वे भी सम्मिलित हैं जिनके पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं है. इस सर्वेक्षण में ज्यादातर उत्तरदाता स्नातक थे(४१%),इसके बाद अन्य तीन वर्गों में भी कोई महत्वपूर्ण अन्तर नहीं था- परास्नातक(२९%),इन्तेर्मेदिअते(२८.१०%)तथा वे जिनके पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी(३१%)।
सर्वेक्षण के आंकडे यह दर्शाते हैं कि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कभी भी किसी भी प्रकार के तम्बाकू का सेवन नहीं किया और ४३ प्रतिशत उत्तरदाता तम्बाकू का सेवन करते थे.
सर्वेक्षण के तथ्य यह दर्शाते हैं कि ४४ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले ०-५ वर्ष से तम्बाकू का सेवन करते हैं, ४३ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले ५-१० वर्षों से तम्बाकू का सेवन करते हैं, १२ प्रतिशत उत्तरदाता पिछले १५-२० वर्षों से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं, जबकि १ प्रतिशत उत्तरदाता २० वर्षों से अधिक से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं.
तम्बाकू के परंपरागत प्रकार जैसे कि पान अब पुराणी पीढी का शौक मन जाता है, नई पीढी अब तम्बाकू के न ए प्रकार जैसे- तम्बाकू टूथपेस्ट, गुटखा और सिगारेत्ते का सेवन करती है.तम्बाकू प्रयोग में गुटखा सबसे ज्यादा प्रचिलित है. हमारे सर्वेक्षण के अनुसार, ३९ प्रतिशत उत्तरदाता गुटखे का सेवन करते हैं,३२ प्रतिशत सिगारेत्ते पिटे हैं,१० प्रतिशत बीडी पीते हैं,जबकि १९ प्रतिशत इनमें से सभी प्रकार के तम्बाकू का सेवन करते हैं.
इशवा स्वस्थ्य संगठन के एक अध्धयन के अनुसार वर्ष १९९१ से २००२ के बीच प्रर्दशित ४४० बॉलीवुड फिल्मों में तम्बाकू सेवन दिखाया गया था, इनमें से भी चार में से तीन फिल्मों में सिगारेत्ते के मध्यम से तम्बाकू सेवन दिखाया गया है. फिल्मों में मुख्या किरदार द्वारा तम्बाकू सेवन अक्सर युवाओं को सिगारेत्ते पीने कि तरफ़ आकर्षित करता हैं क्यूंकि वे इसे फैशन और स्टाइल का प्रतीक मानने लगते हैं.३६ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने सभी तीन कारणों से – व्यावसायिक या निजी तनाव, अपने से बड़ों को सेवन करते हुए देखने से, फिल्मी कलाकारों को या फैशन से प्रभावित होकर तम्बाकू का सेवन शुरू किया . ३० प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने तनाव कि वजह से तम्बाकू का सेवन शुरू किया.
विश्व स्वस्थ्य संगठन तथा रोग नियंत्रण केंद्र के समर्थन से भारत में वर्ष २०००-२००४ के बीच वैश्विक युवा तम्बाकू सर्वेक्षण किया गया जिस के अनुसार
करीब ६८.५ प्रतिशत छात्र जो सिगरेट पीते थे, वे इसे छोड़ना चाहते थे जबकि ७१.४ प्रतिशत पिछले वर्षों में इसे छोड़ने का प्रयास कर चुके हैं. पुरे भारत में, ८४.६ प्रतिशत सिगारेत्ते पीने वाले छात्रों को परिवार के सदस्यों, समुदाय के लोगों, डॉक्टर और मित्रो द्वारा इसे छोड़ने के विषय में सलाह एवं सहायता मिली है.
लखनऊ में किए गए हमारे सर्वेक्षण के आंकडो के अनुसार ६९ प्रतिशत सर्वेक्षण उत्तरदाताओं ने तम्बाकू सेवन कि आदत को छोड़ने कि कोशिश कि है, ३१ प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने तम्बाकू सेवन छोड़ने कि कभी कोई कोशिश नही कि.
लिखित चेतावनी, टैक्स तथा अन्य प्रतिबन्ध जो सिगारेत्ते के पैकेट पर दिखाई देती हैं वे अन्य तम्बाकू उत्पादों पर अक्सर नही होते. गुटखा, बीडी और अन्य तम्बाकू उत्पादों का उत्पादन तथा मार्केटिंग कुछ हद तक असंगठित सेक्टर द्वारा किया जाता है, जिस कारन इन पर नियम तथा कानून लागु करने में परेशानी आती है. परन्तु जब यह सवाल पूछा गया कि बीडी और सिग्रत्ते में से कौन ज्यादा नुकसानदायक है तो ४९ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि दोनों ही बराबर नुकसानदायक है, ३० प्रतिशत ने कहा कि बीडी ज्यादा नुकसानदायक है .माय २००८ में भारत के स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जरी किए गयी बीडी मोनोग्राफ के अनुसार बीडी कम से कम सिगारेत्ते के बराबर नुकसानदायक है ही.
भारत के समतुल्य देश जैसे ब्राजील, थाईलैंड, सिंगापुर, होन्ग कोंग, उरुगुए, वेनेज़ुएला तथा अन्य विकसित देशो ने तम्बोकू के पैकेट का ५० प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा फोटो वाली चेतावनी को दिया है। सर्वेक्षण के अनुसार ५२ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मन कि पैकेट पर फोटो वाली चेतावनी से जागरूकता बढेगी जबकि ४५ प्रतिशत लोगों का यह मन्ना था कि इससे जागरूकता पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा. फोटो वाली चेतावनी का अभी भारत में लागु होना बाकि है इस लिए यह उत्तर लोगों के अनुमानों पर आधारित हैं. पुरे विश्व में फोटो वाली चेतावनी से जागरूकता बढ़ी है, तम्बाकू का सेवन करने वाली संख्या में कमी ई है और इसने तम्बाकू का सेवन छोड़ने के लिए लोगों को प्ररित किया है।
थाईलैंड, ब्राजील और एउरोपेये संघ, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और बेल्जियम जैसे देशों में फोटो वाली चेतावनी द्वारा तम्बाकू सेवन करनेवालों के प्रतिशत में भरी कमी आयी है. इन सभी देशों में इस चेतावनी के लागु होने के बाद १% प्रतिशत प्रतिवर्ष कि गिरावट ई है लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण में ३७ प्रतिशत उत्तरदाताओं का मन्ना था कि फोटो वाली चेतावनी से लोग तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित होंगे जबकि ५६ प्रतिशत लोगों का मन्ना था कि फोटो वाली चेतावनी से लोग तम्बाकू छोड़ने के लिए प्रेरित नहीं होंगे।
व्हो के एक अध्हयाँ के अनुसार इस्चेमिक हार्ट दिसेअसे (इह्द) और अप्रत्यक्ष धूम्रपान का आपस में संबंद होता है, जिन महेलावो या पुरूष के पति अथवा पत्नी सिगारेत्ते पीते हैं उनमे इ ह डी होने कि सम्भावना सामान्य से ३० प्रतिशत अधिक होती है. भारत में अप्रत्यक्ष धूम्रपान के शिकार लोगों में कोरोनरी हार्ट दिसेअसे (चद) कि सम्भावना सिगारेत्ते के धुँए से दूर रहने वालो से २५ प्रतिशत ज्यादा होती है. हमारे सर्वेक्षण के अनुसार ७३ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह कहा कि अप्रत्याक्ष्ढूम्रापन कि रोकथाम के लिए सार्वजनिक तह निजी स्थानों पर धूम्रपान पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लग्न चाहिए।
केरल कि हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कि गयी थी जिसमें एक महिला ने यह शिकायत दर्ज कि थी कि अक्सर बस से यात्रा करते हुए अपने सह-यात्रिओं के सिगारती पीने के कारन उसे स्वस्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ होती हैं. इस अर्जी पर हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान पर बने जन स्वस्थ्य नियम को सरकार को जल्द से जल्द प्रभावकारी ढंग से लागु करना चाहिए. इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर २००१ में पुरे देश में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगा दिया जैसे स्कूल, लाइब्रेरी, रेलवे वेटिंग रूम तथा बस और ट्रेन. भारत के स्वस्थ्य मंत्री, डॉ. अम्बुमणि रामदोस ने यह कहा है कि २ अक्टूबर २००८ से सभी सार्वजनिक तथा निजी स्थानों पर धूम्रपान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाएगा. सर्वेक्षण में इस सवाल के जवाब में ७१ प्रतिशत लोगों का कहना था कि इसे प्रभावकारी ढंग से लागु नहीं किया जा सकेगा जबकि १९ प्रतिशत लोगों का मत था कि सरकार इसे प्रभावकारी ढंग से लागु कर पायेगी.
लोगों को तम्बाकू के नशे से मुक्त कराने के लिए तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्रों को बढ़ावा देने कि जरूरत है. इसका उल्लेख फ्रेमवर्क कन्वेंशन ओं तोबक्को कंट्रोल (फ.क.टी.क) में किया गया है.भारत सरकार और व्हो के प्रयासों से भारत में राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ कि स्थापना कि गई है. लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक मात्र १३ प्रतिशत लोगों को यह पता है कि तम्बाकू उन्मूलन सेवाएँ उपलब्ध हैं जबकि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं को इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी.
भारत में स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पायलट प्रोजेक्ट के अधर पर १३ केन्द्रों पर तम्बाकू उन्मूलन केंद्र स्थापित किए हैं। वर्ष २००२ में व्हो ने तम्बाकू नशा उन्मूलन केंद्र (तक्क) कि विभिन्न स्थानों (हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, कैंसर हॉस्पिटल) पर स्ताथ्पना कि जिस से लोगों को तम्बाकू छोड़ने में मदद दी जा सके. लखनऊ में भी व्हो के सहयोग से ऐसे ही केंद्र को स्ताफित किया गया है. सर्वेक्षण में जब यह सवाल किया गया कि क्या प्रदेश के हर जिला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर ऐसी सुविधा उपलब्ध कराइ जनि चाहिए तो ९६ प्रतिशत लोगों का यह कहना था कि हाँ ऐसी सुविधाएँ हर जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर होनी चाहिए.
लोगों को तम्बाकू के नशे से मुक्त कराने के लिए तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्रों को बढ़ावा देने कि जरूरत है. इसका उल्लेख फ्रेमवर्क कन्वेंशन ओं तोबक्को कंट्रोल (फ.क.टी.क) में किया गया है.भारत सरकार और व्हो के प्रयासों से भारत में राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ कि स्थापना कि गई है. लखनऊ में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक मात्र १३ प्रतिशत लोगों को यह पता है कि तम्बाकू उन्मूलन सेवाएँ उपलब्ध हैं जबकि ५७ प्रतिशत उत्तरदाताओं को इस सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी.
भारत में स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पायलट प्रोजेक्ट के अधर पर १३ केन्द्रों पर तम्बाकू उन्मूलन केंद्र स्थापित किए हैं. वर्ष २००२ में व्हो ने तम्बाकू नशा उन्मूलन केंद्र (तक्क) कि विभिन्न स्थानों (हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, कैंसर हॉस्पिटल) पर स्ताथ्पना कि जिस से लोगों को तम्बाकू छोड़ने में मदद दी जा सके. लखनऊ में भी व्हो के सहयोग से ऐसे ही केंद्र को स्ताफित किया गया है. सर्वेक्षण में जब यह सवाल किया गया कि क्या प्रदेश के हर जिला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर ऐसी सुविधा उपलब्ध कराइ जनि चाहिए तो ९६ प्रतिशत लोगों का यह कहना था कि हाँ ऐसी सुविधाएँ हर जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वस्थ्य केन्द्रों पर होनी चाहिए.