Friday, May 1, 2009
किसान विद्यालय किसानों को पढानें का नायाब तरीका
किसान विद्यालय किसानों को पढानें का नायाब तरीका है। जो किसानो को उनके अनुभवों को बाँटने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है। दुनिया का पहला किसान विद्यालय वर्ष १९८९ में इंडोनेशिया के जावा दीप में खोला गया था। यह विद्यालय धान की फसल बोने वाले उन किसानों के बीच खोला गया था जो लम्बे समय से रसायनों का प्रयोग कित्नाशाको के रूप में कर रहे थे। किसान विद्यालय की परिकल्पना के पीछे मूल बात यह थी की किसान जो प्रतिदिन खेती के प्रयोग में लगे रहतें हैं उनके ही अनुभवों के माध्यम से उनसे जैविक कृषि, कृषि पारिस्थितिकी, कृषि आर्थिकी और कृषि पर्यावरण की बात की जा सके। इस तरह कृषि में रोज किये जा रहे उनके प्रयोग और व्यावहारिक ज्ञान का समग्र रूप से लाभ उठाया जा सके।
उत्तर प्रदेश में सन २००० में कृषि विविधिकरण परियोजना को प्रयोग के तौर पर अपनाया गया। जिसे प्रचिलित रूप में डास्प परियोजना के नाम से जाना जाता है। इसके तहत प्रदेश में किसान स्कूलों का गठन किया गया। इन स्कूलों की विशेषता यह थी की इनकी अपनी एक सुगठित नियमावली थी। इसके पीछे उनकी सोच विद्यालय को सुचारू रूप से चलाना था। ताकि विद्यालय से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्य का बोध हो सके।
इस सम्बन्ध में गोरखपुर envayrme एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डाक्टर शिराज ० ए० वजीह का कहना है ' की गोरखपुर एन्वय्र्मेंतल एक्शन ग्रुप लम्बे समय से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कृषि और उसकी चुनौतियों को लेकर कार्य कर रही है। जो पिछले पॉँच सालों से गोरखपुर के दो ब्लाकों में कुल १२ स्कुल चला रही है। सभी किसान स्कूल किसानों की खेती में आने वाली समस्याओं पर चर्चा करने और उनके समाधान पाने के लिए एक कारगर मंच साबित हुए हैं।
यह स्कूल अपने स्वरुप में बेहद अनौपचारिक हैं। तीन से चार गांवों के बीच किसी सार्वजनिक स्थल पर चलने वाले इन स्कूलों का कोई भी किसान बिना कोई पैसा दिए सदस्य बन सकता है। इन स्कूलों की बैठक माह में एक बार होती है। किसानों की समस्या को जानने के लिए पीले रंग का एक समस्या कार्ड होता है जिसे स्कुल के १५ दिन पहले गांवों में वितरित कर दिया जाता है। स्कूल के दिन समस्या कार्डों द्वारा चुनी गई और वर्गीकृत की गई समस्याओं पर चर्चा की जाती है। इन समस्याओं का समाधान किसानों के आपसी अनुभवों से निकालने की कोशिश की जाती है। प्रत्येक स्कूल के दिन समस्याओं के समाधान के लिए उस विषय के जानकार भी रहते हैं। इन स्कूलों की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है की स्कूल से जुड़े लोग साल भर की कार्ययोजना ख़ुद एक साथ बैठ कर बनाते हैं। जिसमें कृषि सम्बन्धी माहवार चर्चा के विषय और कार्य निर्धारित किये जाते हैं।
पिछले पॉँच सालों में गोरखपुर के दो ब्लाकों में गोरखपुर envayrme एक्शन ग्रुप के कुल ग्यारह स्कूल चल रहे हैं। सभी किसान स्कूल किसानों की खेती में आने वाली समस्याओं पर चर्चा करने और उनके समाधान पाने के लिए एक कारगर मंच साबित हुए हैं।
मास्टर ट्रेनर किसान स्कूलों की एक मजबूत कड़ी है। किसान स्कूलों में आने वाली समस्याओं के चुनाव और निराकरण में इनकी प्रमुख भूमिका है। महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में किसान स्कूलों का दूसरा बड़ा योगदान यह है की इन स्कूलों नें महिलाओं को तकनिकी रूप से मजबूत तथा सबल बनाने का काम किया है। स्कूल से जुड़ने के पश्चात् महिलाओं को न केवल बाहर की दुनिया में कदम रखने का साहस दिया है बल्कि उन्हें कृषि तकनिकी के विषय में जानकर बनाने का काम भी किया है। कुछ महिलाएं कृषि तकनिकी की इतने सफल जानकार के रूप में सामने आई हैं की उन्हें समय-समय पर गैर व् कम रासायनिक खेती के सम्बन्ध में प्रशिक्षण देने के लिए अन्य संस्थओं द्वारा निमंत्रण दिया जाता है. इस तरह हम देखते हैं की किसान विद्यालय किसानो के लिए एक प्रभावी माध्यम हो सकते हैं उनके खेती सम्बन्धी उचित ज्ञान के लिए.
Monday, February 2, 2009
काला अज़ार के रोगियों के लिए पर्याप्त जाँच और दवाएं उपलब्ध नहीं
काला अज़ार के रोगियों के लिए पर्याप्त जाँच और दवाएं उपलब्ध नहीं
प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे काला अज़ार पर चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) में भाग ले रहे चिकित्सकों का मानना है की काला अज़ार का अनुपात कम करने के लिए और काला अज़ार के उपचार के लिए जो दवाइयाँ हैं उनके प्रति लोगों में प्रतिरोधकता का दर कम करने के लिए, यह आवश्यक है कि काला अज़ार के उपचार के लिए असरदायक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए और इसकी जाँच होने के लिए सुविधाएँ बढ़ाई जाए। इस अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) एक अति-महत्त्वपूर्ण शोध के परिणाम घोषित कर रहा है जिसके अनुसार काला अज़ार के उपचार में "लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी" (अम्बिसोम) एक प्रभावकारी भूमिका निभा सकता है।
बिहार प्रदेश में, जहाँ काला अज़ार महामारी का रूप लिए हुए है, वहाँ पर 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) के शोध से यह नतीजा सामने आया है कि 'लिपोसोमल अम्फोतेरीसिन बी' से काला अज़ार का उपचार अत्यधिक प्रभावकारी है, और सफल इलाज का दर ९८% आया है, काला-अज़ार सम्बंधित मृत्यु दर भी कम हुआ है और काला अज़ार का उपचार सफलतापूर्वक पूरा करने वालों के दर में भी गिरावट आई है। इस 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से काला अज़ार के उपचार करने पर, इस रोग के दुबारा होने के दर में भी कमी आई है, यह दवाएं कम 'टोक्सिक' हैं, और उपचार की अवधि अन्य दवाओं के मुकाबले कम है।
"हालाँकि काला अज़ार के उपचार के लिए 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' एकमात्र दवा नहीं है, परन्तु यह शोध द्वारा प्रमाणित हुआ है कि यह सबसे प्रभावकारी और सुरक्षित इलाज का विकल्प है। हमारा मानना है कि इस दवा को 'काला अज़ार के उपचार के लिए भारतीय प्रोटोकोल' में शामिल करना चाहिए" कहना है डॉ० नायिन्स लीमा का जो 'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) की 'ट्रोपिकल' चिकित्सक सलाहाकार हैं।यदि काला अज़ार का इलाज न किया जाए, तो यह घातक भी हो सकती है।
मानव में काला अज़ार का रोग, काला-अज़ार से संक्रमित 'सैण्ड' मक्खी के काटने से फैलता है। हालाँकि विकसित देश काला अज़ार से संभवत: अनभिज्ञ हैं, यह 'पैरासिटिक' रोग विश्व में लगभग १ करोड़ २० लाख लोगों को ग्रसित किए हुए है। प्रति वर्ष लगभग ५ लाख लोग काला अज़ार से संक्रमित होते हैं, और इनमें से ५० प्रतिशत भारत में है। भारत में काला अज़ार विशेषकर बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में महामारी का अनुपात लिए हुए है। इन भारतीय प्रदेशों में काला अज़ार मुख्यत: ग्रामीण छेत्रों में हाशिये पर रह रहे गरीब लोगों को ही सबसे भयंकर तरीके से प्रभावित करता है।
'सोडियम स्टिबोग्लूकोनेट', काला अज़ार का सबसे प्रचलित उपचार है। परन्तु इस दवा से लोगों में बढ़ती प्रतिरोधकता अत्यन्त चिंता का विषय है - खासकर कि भारत में, जहाँ लगभग ६५ प्रतिशत रोगियों को ऐसा काला अज़ार होता है जिसका कीटाणु संक्रमण के पहले से ही इस दवा के प्रति प्रतिरोधक होता है, और इसीलिए इन लोगों में यह दवा असरकारी होगी ही नहीं। शोध एवं विकास कार्यक्रमों ने काला अज़ार को नज़रअंदाज़ किया है।"विकासशील देशों में काला अज़ार के रोगियों को बहुत लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया है। हमारे प्रोजेक्ट में, लोग तब स्वास्थ्य केन्द्र पर आते हैं जब काला अज़ार का रोग बहुत बढ़ गया होता है क्योंकि इन लोगों को न तो काला अज़ार के प्रारंभिक लक्षण के बारे में जानकारी होती है, और न ही यह पता होता है कि काला अज़ार की जांच के लिए और इलाज के लिए कहाँ जाएँ", कहना है गारेथ बैरेट का।
"जिन लोगों में काला अज़ार का अनुपात अत्याधिक है, उनको जांच और उपचार उपलब्ध नहीं है, और गरीबी के कारण अक्सर इन्हीं लोगों में उपचार गुणात्मक दृष्टि से कमजोर होता है, जिससे काला अज़ार फैलने का खतरा और दवा के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है" 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' दवा से काला अज़ार के उपचार का खर्च रुपया २१,८५५ (यूरो ३५०) प्रति रोगी आता है जो बहुत महँगा है। "इस दवा की कीमत को जल्द-से-जल्द कम करने की आवश्यकता है, 'जेनेरिक' दवाएं एवं अन्य दवाओं के साथ मिलाकर इसको बनाने की भी जरुरत है जिससे कि भारत जैसे देशों में यह दवा काला अज़ार के उपचार के लिए प्रथम इलाज का विकल्प हो" कहना है गारेथ बैरेट का।
'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्।एस।ऍफ़) इस सत्य का स्वागत करता है कि काला अज़ार पर अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन भारत में संपन्न हो रहा है, और भारत से अपील करता है कि वोह काला अज़ार की रोकधाम के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाने का वादा करे, और जो लोग समाज में हाशिये पर रहते हैं और काला अज़ार से सबसे अधिक संक्रमित हो सकते हैं, उन तक काला अजार की जांच एवं उपचार सेवाएँ उपलब्ध कराये।'सरहद-रहित चिकित्सकों' (मेडिसिन्स सांस फ्रंटइर्स - एम्.एस.ऍफ़) एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है, जो भारत में १९९९ से कार्यरत है। बिहार में हाजीपुर रेफेरल अस्पताल में, एम्.एस.ऍफ़ काला अज़ार की जांच और उपचार सेवाएँ लोगों को प्रदान कर रहा है। जुलाई २००७ से एम्.एस.ऍफ़ ने ६,५०० से भी अधिक लोगों को काला अज़ार की जांच सेवाएँ उपलब्ध करायी हैं, और इनमें से जिन २,५०० लोगों को काला अज़ार संक्रमण था, उनको 'लिपोसोमल अम्फोतेरिसिन बी' से उपचार उपलब्ध कराया है।
अमित द्विवेदी